Akbar Birbal Moral Story~ Kubda Dhobi in Hindi

एक दिन की बात है बीरबल के कांड में भड़क परी की एक दूसरा अत्याचारी आदमी साधु का भेष धारण कर लोगों को अपनी जाल में फंस आता है और उन्हें प्रसाद मे धतूरे के बीच खिलाकर लूट लेता है.
यह काम हुआ धन के लालच में करता था. धतूरा का प्रसाद खाकर कोई मर जाता था तो कोई बेहोश हो जाता था.
धतूरा मिला जहरीला प्रसाद खिलाने वाले इस दुष्ट व्यक्ति के खिलाफ कोई सबूत हासिल नहीं हो पा रहा था. इसलिए वह खुलेआम सीना तान कम रहता था. बीरबल उस दुष्ट व्यक्ति के पास गया और उसे बातों में लगाए रखकर उस विक्षिप्त व्यक्ति के पास ले गया, जिसे उसने प्रसाद खिला कर पागल जैसा बना दिया था. वहां पहुंचकर चुपके से बीरबल ने उस दुष्ट व्यक्ति का हाथ पागल के सिर पर दे मारा. उस पागल ने भी आप देखा ना पाऊं, उस आदमी के बाल पकड़कर उसका सिर पत्थर पर मारना शुरू कर दिया. वह व्यक्ति पागल तो था ही, उसने उससे इतना मारा कि वह साधु पाखंडी वही मर गया.
यह मामला बादशाह अकबर के पास पहुंचा.
अकबर ने पागल को तो बड़ी कर दिया, लेकिन क्रोध में बीरबल को यह सजा दी की इसे हाथी के पांव से कुचलवाया जाए, क्योंकि इसी में इस पागल व्यक्ति का सहारा लेकर कुछ साधु के प्राण लिए हैं.
अकबर के आदेशानुसार दो सिपाही बीरबल को शाम के समय एक सुनसान एकांत स्थान पर ले गए और उसे गर्दन तक जमीन में दबा दिया. इसके बाद वे हाथी लेने चले गए. सैनिकों ने सोचा कि गर्दन तक दवा होने से यह भाग भी कैसे सकता है.
सैनिकों के जाने के कुछ देर बाद वहां से एक कुबरा धोनी गुजर रहा था. धोबी ने बीरबल से पूछा ” क्यों भाई, यह क्या तमाशा है? तुम इस तरह जमीन में क्यों गड़े हुए हो?”
बीरबल ने उससे कहा, ” कभी मैं भी तुम्हारी तरह कुबड़ा ही था, पूरे 10 साल तक मैंने यह यातना झेली, लोग मुझ पर हंसते थे यहां तक कि मेरी पत्नी भी. एक दिन अचानक मुझे एक साधु मिले- वह मुझसे बोले, ” इस पवित्र जगह पर गड्ढा खोदकर पूरे दिन इसमें दवे रहो तो तुम्हारा कुबड़ापन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. मैंने ऐसा ही किया. अब इस पवित्र स्थान पर मुझे पूरा 1 दिन आंखें बंद किए और बिना एक शब्द भी बोले गर्दन तक जमीन में दबे पूरा दिन हो गया, तुम मिट्टी खोदकर मुझे बाहर निकाल कर जरा देखो तो, कि मेरा कुबड़ापन खत्म हुआ या नहीं?
फिर धोबी ने उसके चारों ओर की मिट्टी खोदी और बिरबल को बाहर निकाल लिया उसे देख कर दो भी बहुत हैरान हुआ. और उसे में बीरबल के कुबड़ापन दिखाई नहीं दिया.
अब वध होगी बीरबल से बोला, ” मुझे सालों हो गए इस कुबड़ापन के बोझ को ढोतें होते हुए. मैं नहीं जानता था कि इसका इलाज कितना आसान है. मुझ पर भी तुम कृपा करो और मुझे भी यहां गाड़ दो. मेरे लिए सवेरे मेरा नाश्ता यही ले आना. मैं तुम्हारा यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगा. और हां, मेरी बीवी को यह मत बताना कि कल तक मेरा कुबड़ापन ठीक हो जाएगा. मैं कल स्वयं उसे सरप्राइज करना चाहता हूं.
” बहुत अच्छा” बीरबल ने उस कुबड़े धोबी को कहा और उसे गर्दन तक वहीं पर मिट्टी में दबा दिया. फिर उसके कपड़े बगल में दबाकर बोला, ” अच्छा, तो मैं चलता हूं. आप अपनी आंखें बंद रखना और मुंह भी. चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए, नहीं तो मेरी सारी मेहनत बेकार हो जाएगी और तेरा कुबड़ापन भी बढ़ जाएगा.
” मैं वही करूंगा जैसा तुमने बताया है. इस कुबड़ापन के कारण मैंने बहुत दुख उठाए हैं. अपने इस दोष को दूर करने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.” धोबी ने कहा.
बीरबल वहां से चलता बना.
कुछ देर बाद बादशाह के सिपाही एक हाथी को लेकर वहां पहुंचे और उस व्यक्ति का सिर हाथी के पैरों से दबा दिया.
सिपाहियों को पता ही ना चला कि यह बीरबल नहीं कोई और व्यक्ति है.
सिपाही बीरबल की मृत्यु का समाचार लेकर बादशाह के पास पहुंचे. तब तक उनका क्रोध ही शांत हो गया था और वे दुखी थे, क्योंकि उन्होंने बीरबल को जल्दी बाजी में मृत्युदंड दे दिया था. तब तक बादशाह सलामत को पाखंडी साधु के बारे में भी हमें काफी जानकारी हासिल हो गई थी. अकारण ही बादशाह सलामत ने बीरबल को इतना कठोर दंड दे दिया. उसने तो ऐसे अपराधी को दंड दिया था, ” जिसे हमारे सुरक्षाकर्मी भी नहीं पकड़ सके थे.”
बादशाह अकबर सोच में ही डूबे थे कि बीरबल दरबार में आ पहुंचा और बोला, ” बादशाह सलामत की जय हो!”
बादशाह अकबर भौंचक्के से बीरबल के चेहरे की ओर निहार रहे थे. फिर बीरबल ने जो कुछ उनके ऊपर बीता था और उसने कैसी युक्ति से अपनी जान बचाई थी सारा वृत्तांत भाषा को का सुनाया.
फिर बादशाह अकबर ने उसे क्षमा कर दिया.
शीख: हमें कभी भी कोई फैसला लेने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. फैसला सोच समझ कर ही लेना चाहिए.

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